कवि की वेदना
कौन सी कविता लिखूं , कौन सा अब छन्द लिख दूँ
अब नहीं लिखती ऋचायें ,
प्रेम के अनुबंध जग में
खामोश हैं सब तूलिकाये
शूल सी चुभती है दृग में
छूटती संवेदनाये ,
टूटती सब वर्जनायें ,
हतप्राण है मन चेतना कागज पे कोरा द्वंद लिख दूँ
आग का पानी से कैसा ,कौन सा उपबन्ध लिख दूँ
कौन सी कविता लिखूं कौन सा अब छन्द लिख दूँ
बागवां बैरी चमन का
फूल हरसु आशना है
कैद में भँवरे हुए है
आज फिर कुहरा घना है
बह रही बैरन हवायें
शूल सी चुभती सदायें
ख़ुशबूयें विधवा हुई ,चोरी हुआ मकरन्द लिख दूँ
तुम कहो तो तितलियों को आज मैं जयचंद लिख दूँ ।।
कौन सी कविता लिखूं कौन सा अब छन्द लिख दूँ
क्या हुआ है इस जमीं को
क्या हुआ है आसमां को
कलम जकड़ी बेड़ियों में
बेचती जर कौड़ियों में
जल रही अक्षर चितायें
राज करती हैं बलायें
मखमली ख़्वाबों के आगे , टाट का पैबंद लिख दूँ
हूँ खड़ा काशी के घट पे , किस तरह मृदुगन्ध लिख दू
कौन सी कविता लिखूं कौन सा अब छन्द लिख दूँ
लड़ रहे क्यो रंग आखिर
लड़ रही क्यो टोपियां है
आज बंशी के मुखातिब
सामने क्यो गोपियां है
फिर तिरंगे के मुकाबिल
कौन सी ये हैं झंडिया हैं
कश्तियां साहिल पे डूबी, कौन सा तटबंध लिख दूँ
रेत के रिश्तों का अब क्या , लहरों से सबंध लिख दूँ
कौन सी कविता लिखूं कौन सा अब छन्द लिख दूँ
(C) विनय चौधरी - भोपाल
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